जेल भी गए, पाबंदी भी झेली, फिर भी नहीं रुका जिमनास्टिक्स को बदलने का जुनून; दिलचस्प है फ्रेडरिक यान की कहानी

जेल भी गए, पाबंदी भी झेली, फिर भी नहीं रुका जिमनास्टिक्स को बदलने का जुनून; दिलचस्प है फ्रेडरिक यान की कहानी

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज जब हम ओलिंपिक में जिमनास्टिक्स के हैरतअंगेज करतब करते देखते हैं, तो मन में रोमांच भर जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शानदार खेल की नींव किसने रखी थी? यह कहानी है 19 वीं सदी के जर्मनी के एक ऐसे शख्स की, जिसने जिमनास्टिक्स को महज एक खेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे युवाओं में जोश और राष्ट्रीय चेतना जगाने का एक सशक्त माध्यम बना दिया। आधुनिक जिमनास्टिक्स के इस जनक का नाम है- फ्रेडरिक लुडविग यान। आइए जानते हैं कैसे एक साधारण गांव से निकलकर उन्होंने खेल की दुनिया में इतनी बड़ी क्रांति ला दी। सादगी और अनुशासन से गढ़ी सफलता फ्रेडरिक लुडविग यान का जन्म 11 अगस्त 1778 को जर्मनी के ब्रांडेनबर्ग इलाके के एक छोटे से गांव लांज में हुआ था। उनके पिता पेशे से एक पादरी थे। उनका परिवार कोई बहुत अमीर नहीं था, इसलिए फ्रेडरिक का बचपन गांव के साधारण और अनुशासित माहौल में बीता। पढ़ाई-लिखाई को लेकर वे बचपन से ही गंभीर थे। साल 1796 से लेकर 1802 तक, उन्होंने हाले, फ्रैंकफर्ट आन डर ओडर, गोटिंगेन और ग्राइफ्सवाल्ड जैसे जाने-माने विश्वविद्यालयों से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने धर्मशास्त्र, इतिहास और भाषाशास्त्र की गहरी पढ़ाई की और आगे चलकर एक शिक्षक की भूमिका अपनाई। स्कूलों में की फिटनेस ट्रेनिंग की शुरुआत साल 1806 में कुछ ऐसा हुआ जिसने फ्रेडरिक यान की सोच को पूरी तरह बदल कर रख दिया। नेपोलियन बोनापार्ट की सेना ने प्रूशिया को युद्ध में हरा दिया था। इस हार से फ्रेडरिक को गहरा धक्का लगा। उन्होंने महसूस किया कि देश की इस हार का एक बड़ा कारण यह भी है कि जर्मन युवाओं में शारीरिक ताकत और आत्मविश्वास की कमी है। उन्हें लगने लगा कि अगर समाज को मजबूत बनाना है, तो युवाओं का मानसिक और शारीरिक रूप से ताकतवर होना बेहद जरूरी है। इसी सोच के साथ 1809 में वे बर्लिन पहुंचे और वहां के 'ग्राउएस क्लोस्टर स्कूल' में पढ़ाने लगे। यहीं से उन्होंने बच्चों को बंद कमरों से निकालकर खुले मैदान में कसरत और ट्रेनिंग देना शुरू किया। उस दौर में स्कूलों के अंदर शारीरिक शिक्षा का कोई चलन नहीं था, इसलिए यह अपने आप में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम था। बनाया दुनिया का पहला ओपन-एयर जिमनास्टिक्स मैदान साल 1811 में फ्रेडरिक यान ने इतिहास रच दिया। उन्होंने बर्लिन के पास 'हासेनहाइडे' नाम की जगह पर दुनिया का सबसे पहला ओपन-एयर जिमनास्टिक्स मैदान तैयार किया। इस मैदान को 'टर्नप्लात्स' का नाम दिया गया। यहां युवाओं को शरीर का संतुलन बनाने, दौड़ने, कूदने और चढ़ाई करने की सख्त ट्रेनिंग दी जाती थी। क्या आप जानते हैं कि ओलिंपिक जिमनास्टिक्स की जान माने जाने वाले उपकरण, जैसे पॉमेल हॉर्स, समानांतर बार, हॉरिजॉन्टल बार और बैलेंस बीम- ये सब फ्रेडरिक यान के ही बनाए हुए हैं?

देखते ही देखते हजारों छात्र उनके इस अभियान का हिस्सा बन गए। जिमनास्टिक्स को दिया आधुनिक रूप फ्रेडरिक के लिए जिमनास्टिक्स केवल कसरत नहीं था। वे इसे युवाओं का चरित्र सुधारने, उनमें अनुशासन लाने और देश को एकजुट करने का जरिया मानते थे। इसी मकसद से उन्होंने पूरे जर्मनी में टर्नवेरेन यानी जिमनास्टिक्स क्लबों का जाल बिछा दिया। इन क्लबों में युवाओं को कसरत के साथ-साथ देशभक्ति और लीडरशिप की भी तालीम दी जाती थी। खेल को नियमबद्ध करने के लिए 1816 में उन्होंने अपने एक साथी अर्न्स्ट आइसेलेन की मदद से 'डी डॉयचे टर्नकुस्टो' नाम की किताब छापी। इसे आज भी आधुनिक जिमनास्टिक्स की पहली सबसे बड़ी नियमावली का दर्जा हासिल है। फ्रेडरिक को क्यों जाना पड़ा था जेल?

फ्रेडरिक सिर्फ एक ट्रेनर नहीं थे, बल्कि वे खुद भी मैदान-ए-जंग में उतरे थे। 1813 में उन्होंने नेपोलियन के खिलाफ लूटजोव फ्री कॉर्स में शामिल होकर युद्ध लड़ा था। युवाओं के बीच उनके राष्ट्रवाद के विचार आग की तरह फैल रहे थे और वे बहुत लोकप्रिय हो गए थे। मगर उनकी यही लोकप्रियता प्रूशिया की सरकार की आंखों में खटकने लगी। 1819 में एक राजनीतिक हत्या का बहाना बनाकर सरकार ने टर्नवेरेन आंदोलन पर पूरी तरह से बैन लगा दिया। यान को गिरफ्तार कर लिया गया और कोलबर्ग के किले में कैद कर दिया गया। करीब एक साल बाद उन्हें जेल से रिहाई तो मिल गई, लेकिन उनके जिमनास्टिक्स सिखाने पर पाबंदी लगा दी गई। यह प्रतिबंध 1840 के दशक तक चला। आखिरकार 15 अक्टूबर 1852 को आधुनिक जिमनास्टिक्स के इस महान जनक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। यह भी पढ़ें- जब हाथों से लिखी जाती थीं खबरें!

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