लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दुनिया के नक्शे पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हमेशा से ऐसी जगहें रही हैं जहां आम इंसान जाने की सोच भी नहीं सकता, लेकिन नॉर्वे में एक ऐसा जुनूनी शख्स पैदा हुआ, जिसने इन दोनों बर्फीले किनारों को फतह कर लिया। इस महान ध्रुवीय खोजकर्ता का नाम था रोआल्ड एमंडसन। आज भी अन्वेषण की दुनिया में उनका नाम बड़े अदब से लिया जाता है। आइए जानते हैं कि कैसे उन्होंने पूरी दुनिया को अपने साहस से हैरत में डाल दिया। (Image Source: Instagram) मां का सपना छोड़ा, समंदर को बनाया हमसफर 16 जुलाई 1872 को नॉर्वे के एक जहाजरानी परिवार में जन्मे एमंडसन का दिल बचपन से ही समंदर की लहरों में बसता था। उन्हें ब्रिटिश खोजकर्ता जॉन फ्रैंकलिन की साहसिक कहानियों को पढ़ने का बड़ा शौक था। हालांकि, उनकी मां की ख्वाहिश थी कि बेटा ओस्लो विश्वविद्यालय से मेडिकल की पढ़ाई करके डॉक्टर बने। एमंडसन ने मां की बात मानी भी, लेकिन 1893 में मां के गुजर जाने के बाद उन्होंने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह समंदर को सौंप दिया और व्यापारी जहाजों पर काम करते हुए बर्फीले रास्तों का पक्का व्यावहारिक तजुर्बा हासिल किया। जब 3 साल की यात्रा ने दुनिया को कर दिया हैरान एमंडसन के कारनामों की असली शुरुआत 1903 में हुई, जब वे 'ग्योआ' नाम के एक छोटे से जहाज पर अपने छह साथियों के साथ आर्कटिक की ओर निकल पड़े। यह सफर इतना मुश्किल था कि इसे पूरा होने में लगभग तीन साल लग गए। आखिरकार 1906 में, उन्होंने पहली बार पूरे उत्तर-पश्चिमी समुद्री मार्ग को पार करने का ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने चुंबकीय उत्तरी ध्रुव के पास कई अहम वैज्ञानिक शोध भी किए, जिससे दुनिया भर में उनका रुतबा काफी बढ़ गया और भविष्य के बड़े अभियानों के रास्ते खुल गए। (Image Source: Instagram) स्लेज डॉग्स के दम पर दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक फतह एक बड़ी कामयाबी के बाद एमंडसन का हौसला सातवें आसमान पर था। साल 1910 में उन्होंने अंटार्कटिका को अपना अगला लक्ष्य बनाया। यह कोई तुक्का नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक बेहद सधी हुई वैज्ञानिक रणनीति थी। रास्ते में खाने और ईंधन के भंडार बनाए गए और बर्फ पर तेज चलने के लिए स्लेज डॉग्स को टीम में शामिल किया गया। कई हफ्तों की हाड़ कंपा देने वाली मेहनत के बाद, 14 दिसंबर 1911 को एमंडसन अपने चार साथियों के साथ दक्षिणी ध्रुव के अंतिम बिंदु पर पहुंच गए। दुनिया में ऐसा करने वाले वे पहले इंसान थे। सबसे खास बात यह रही कि उनकी पूरी टीम अनुशासन और शानदार प्लानिंग के दम पर सुरक्षित वापस भी लौट आई। आसमान के रास्ते उत्तरी ध्रुव का अनोखा रिकॉर्ड दक्षिणी ध्रुव को अपनी मुट्ठी में करने के बाद एमंडसन ने एक बार फिर आर्कटिक की ओर अपना रुख किया। 1926 में उन्होंने 'नाग' नाम की एयरशिप के जरिए उत्तरी ध्रुव का सफल अभियान पूरा किया। इसे उत्तरी ध्रुव के ऊपर से गुजरने वाली पहली प्रमाणित उड़ान माना जाता है। इस अकल्पनीय कारनामे के साथ ही वे पृथ्वी के दोनों भौगोलिक ध्रुवों पर पहुंचने वाले दुनिया के इकलौते और पहले खोजकर्ता बन गए। यह रिकॉर्ड आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। दुनिया के लिए छोड़ी एक बड़ी विरासत 18 जून 1928 को एमंडसन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन ध्रुवीय यात्राओं को वे जो नई पहचान दे गए, वह आज भी मिसाल है। स्कीइंग का इस्तेमाल, स्लेज डॉग्स की मदद और वैज्ञानिक तरीके से यात्रा की रूपरेखा तैयार करना- ये सब उन्हीं की देन है जिसे आज के आधुनिक अभियान भी अपनाते हैं। उनकी इन्हीं बेमिसाल उपलब्धियों के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले: 1907: अमेरिका की नेशनल जियोग्राफिक सोसायटी ने उन्हें हबर्ड मेडल प्रदान किया। 1912: ब्रिटेन की रॉयल जियोग्राफिकल सोसायटी ने उन्हें फाउंडर्स गोल्ड मेडल से नवाजा। यह भी पढ़ें- थिएटर की सीट से परेशान थी मां, बेटे ने कार को ही बना दिया सिनेमाघर; दिलचस्प है Drive-In Theater की कहानी यह भी पढ़ें- फिटनेस के लिए नहीं, सजा के लिए हुआ था ट्रेडमिल का आविष्कार, रोज 8 घंटे कैदियों को तड़पाती थी ये मशीन को Google न्यूज़ पर फॉलो करें Follow us
कहानी रोआल्ड अमंडसेन की, जिनके नाम दर्ज है दुनिया के दोनों ध्रुवों पर सबसे पहले पहुंचने का रिकॉर्ड

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